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पीथमपुर (धार)। शासन स्तर पर राजस्व प्रकरणों के समयबद्ध निराकरण और किसानों को त्वरित न्याय दिलाने के लगातार निर्देश दिए जा रहे हैं, लेकिन धरातल पर उनकी प्रभावशीलता पर सवाल खड़े हो रहे हैं। धार जिले की पीथमपुर तहसील का एक मामला प्रशासनिक उदासीनता और आदेशों के पालन में शिथिलता की तस्वीर पेश कर रहा है।
जानकारी के अनुसार, राजस्व प्रकरण क्रमांक 0003/अ-70/2024-25 में आवेदक मकबूल पिता सुलेमान पटेल, निवासी ग्राम धन्नड़खुर्द, तहसील पीथमपुर, जिला धार द्वारा ग्राम धन्नड़खुर्द स्थित सर्वे नंबर 15/1 एवं 15/2, रकबा 0.831-0.831 हेक्टेयर भूमि के संबंध में मध्यप्रदेश भू-राजस्व संहिता, 1959 की धारा 250 के अंतर्गत आवेदन प्रस्तुत किया गया था। इस आवेदन पर न्यायालय में प्रकरण दर्ज कर सुनवाई की गई तथा आगामी पेशी 9 जून 2025 निर्धारित की गई थी।

मामले से जुड़े दस्तावेजों के अनुसार न्यायालय द्वारा आदेश पारित किए जाने के लगभग एक वर्ष बाद भी आदेश का प्रभावी पालन नहीं कराया जा सका है। इससे यह सवाल खड़ा हो रहा है कि जब न्यायालय का आदेश ही जमीन पर लागू नहीं हो पा रहा है, तब आम नागरिकों को समय पर न्याय कैसे मिलेगा।
धार कलेक्टर राजीव रंजन मीना समय-समय पर राजस्व प्रकरणों के शीघ्र निराकरण, लंबित मामलों को प्राथमिकता से निपटाने तथा न्यायालयीन आदेशों के पालन के निर्देश जारी कर चुके हैं। वहीं प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव तथा धार जिले के प्रभारी मंत्री कैलाश विजयवर्गीय भी किसानों और आमजन से जुड़े मामलों के त्वरित समाधान पर लगातार जोर देते रहे हैं।

इसके बावजूद आवेदक का आरोप है कि पीथमपुर एसडीएम अंकिता प्रजापत, तहसीलदार शिवानी श्रीवास्तव तथा संबंधित पटवारी राजीव तोमर के स्तर पर न्यायालयीन आदेश के प्रभावी क्रियान्वयन में अपेक्षित कार्रवाई नहीं की गई, जिसके कारण आवेदक अब भी न्याय की प्रतीक्षा कर रहा है।
प्रशासनिक व्यवस्था का मूल उद्देश्य केवल आदेश पारित करना नहीं, बल्कि उसका समयबद्ध और प्रभावी पालन सुनिश्चित करना भी है। यदि न्यायालय के आदेश महीनों और वर्षों तक अमल में नहीं आते, तो इससे शासन की जवाबदेही, राजस्व तंत्र की कार्यकुशलता तथा आम नागरिकों के विश्वास पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ना स्वाभाविक है।

अब बड़ा सवाल यह है कि जब शासन और जिला प्रशासन लगातार त्वरित कार्रवाई के निर्देश दे रहे हैं, तब संबंधित अधिकारियों के स्तर पर आदेशों के पालन में देरी क्यों हो रही है? क्या इस मामले में जिम्मेदारी तय कर लापरवाही के लिए जवाबदेही सुनिश्चित की जाएगी, या फिर आवेदक को न्याय के लिए लंबे समय तक सरकारी दफ्तरों के चक्कर ही लगाने पड़ेंगे?
फिलहाल इस पूरे मामले ने पीथमपुर के राजस्व प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े कर दिए हैं। यदि न्यायालयीन आदेशों का समय पर पालन नहीं होता, तो राजस्व न्याय व्यवस्था की प्रभावशीलता पर भी सवाल उठना स्वाभाविक है।
