रंगीला प्रदेश। जीवन डोडिया 9926084685
पीथमपुर (धार)। मध्यप्रदेश सरकार किसानों को त्वरित न्याय और राजस्व मामलों के समयबद्ध निराकरण के बड़े-बड़े दावे कर रही है, लेकिन धार जिले के पीथमपुर तहसील का एक मामला इन दावों की हकीकत सामने ला रहा है। तहसीलदार न्यायालय द्वारा पारित आदेश को एक वर्ष से अधिक समय बीत जाने के बावजूद संबंधित भूमि से अतिक्रमण नहीं हटाया जा सका है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि जब न्यायालय के आदेश का ही पालन नहीं हो पा रहा, तो आम किसान को न्याय कैसे मिलेगा? प्रकरण में सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर एक वर्ष तक प्रशासन करता क्या रहा? यदि अतिक्रमण हटाने में पुलिस बल की आवश्यकता थी तो समय रहते पुलिस की मांग क्यों नहीं की गई? यदि वैकल्पिक व्यवस्था जरूरी थी तो उसे एक वर्ष में भी क्यों नहीं किया जा सका? इन सवालों के जवाब प्रशासन के पास फिलहाल दिखाई नहीं दे रहे हैं।

मामले में पीथमपुर के आरआई दिलीप शाकल्य का कहना है कि, तहसीलदार मैडम से बात करता हूं, नगर पालिका से भी महिला की वैकल्पिक रहने की व्यवस्था करवाते हैं। वहीं तहसीलदार शिवानी श्रीवास्तव का कहना है, कल-परसों ही आरआई और पटवारी को निर्देश दिए हैं कि मौके पर जाकर कब्जा हटाने की कार्रवाई करें। बिना पुलिस बल के कार्रवाई संभव नहीं है। हालांकि इन बयानों ने मामले को और गंभीर बना दिया है। सवाल यह है कि यदि कार्रवाई के लिए पुलिस बल और वैकल्पिक व्यवस्था की जरूरत थी, तो पिछले एक वर्ष में यह प्रक्रिया पूरी क्यों नहीं की गई? आखिर अब जाकर निर्देश देने की नौबत क्यों आई? धार कलेक्टर राजीव रंजन मीना लगातार राजस्व प्रकरणों के शीघ्र निराकरण और न्यायालयीन आदेशों के समयबद्ध पालन के निर्देश देते रहे हैं। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव भी सुशासन और किसानों को त्वरित न्याय देने की बात करते रहे हैं। इसके बावजूद पीथमपुर तहसील में एक आदेश का वर्षों तक पालन नहीं होना प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है। यह मामला किसी व्यक्ति विशेष का नहीं, बल्कि न्यायालयीन आदेश की गरिमा और किसान के वैधानिक अधिकार का है। यदि प्रशासन अपने ही न्यायालय के आदेश को लागू नहीं करा पा रहा है, तो यह शासन की जवाबदेही पर भी सवाल खड़े करता है। सूत्रों के अनुसार यदि आगामी एक सप्ताह के भीतर अतिक्रमण हटाने की प्रभावी कार्रवाई नहीं होती है, तो आवेदक हाईकोर्ट के अधिवक्ता के साथ इंदौर संभागायुक्त डॉ. सुदाम खाड़े से मुलाकात कर पूरे मामले की दस्तावेजों सहित शिकायत प्रस्तुत करेगा। शिकायत में आदेश के बावजूद एक वर्ष तक कार्रवाई नहीं होने, संबंधित अधिकारियों की भूमिका तथा प्रशासनिक लापरवाही की जांच की मांग की जाएगी। अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या पीथमपुर प्रशासन इस बार वास्तव में न्यायालयीन आदेश का पालन कर किसान को उसका अधिकार दिलाएगा, या फिर आश्वासनों और बैठकों का सिलसिला ही चलता रहेगा?







