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सड़क निर्माण की आड़ में निजी भूमि पर तकनीकी अराजकता, किसान के खेत में रातों-रात अवैध पाइपलाइन

लोक निर्माण विभाग की निगरानी विफल, ठेकेदार की मनमानी से किसान की जमीन पर अवैध हस्तक्षेप

रंगीला प्रदेश, देपालपुर जीवन डोडिया। तहसील में तकनीकी नियमों, विधिक प्रक्रियाओं और प्रशासनिक मानकों को ताक पर रखकर निजी भूमि पर अवैध पाइपलाइन बिछाने का गंभीर मामला सामने आया है। ग्राम चटवाड़ा, तहसील देपालपुर किसान दशरथ प्रजापत पिता तुलसीराम प्रजापत ने सड़क निर्माण कार्य से जुड़े ठेकेदार सुरेश कुमार माली के विरुद्ध मध्यप्रदेश भू-राजस्व संहिता की धारा 32 के अंतर्गत तहसीलदार धर्मेंद्र चौकसे को विधिवत शिकायत आवेदन प्रस्तुत करते हुए आरोप लगाया है कि ग्राम चटवाड़ा से नेवरी रोड निर्माण परियोजना के दौरान दिनांक 01 फरवरी 2026 की रात्रि को बिना किसी शासकीय आदेश, बिना प्रशासनिक स्वीकृति, बिना तकनीकी अनुमति, बिना भूमि सीमांकन, बिना अधिग्रहण प्रक्रिया, बिना पूर्व सूचना तथा बिना भूमि स्वामी की सहमति के उसकी निजी कृषि भूमि में जबरन पानी की पाइपलाइन डाल दी गई। शिकायत के अनुसार दशरथ प्रजापत की स्वामित्व एवं आधिपत्य की कृषि भूमि सर्वे नंबर 257/2/2, रकबा 0.380 हेक्टेयर, ग्राम चटवाड़ा, तहसील देपालपुर में स्थित है, जिस पर वह विधिपूर्वक काबिज होकर वर्षों से कृषि कार्य करता आ रहा है, किंतु ठेकेदार द्वारा की गई इस अवैध कार्रवाई से उसकी लगभग 5 से 7 बिसवा भूमि नाले में समाहित होने की स्थिति बन गई है, जिससे खेत में जलभराव, भूमि की उर्वरता समाप्त होने, फसल सड़ने तथा दीर्घकालिक कृषि क्षति की गंभीर आशंका उत्पन्न हो गई है। तकनीकी दृष्टि से यह कार्य पूर्णतः नियमविरुद्ध माना जा रहा है, क्योंकि किसी भी सड़क निर्माण परियोजना में भूमि सीमांकन, राजस्व अभिलेखों का सत्यापन, तकनीकी स्वीकृति, प्रशासनिक अनुमोदन, ड्रॉइंग अप्रूवल, साइट सुपरविजन और प्रभावित भूमि स्वामियों को विधिवत नोटिस जैसी प्रक्रियाएं अनिवार्य होती हैं, जिन्हें पूरी तरह दरकिनार करते हुए रातों-रात निजी भूमि में पाइपलाइन डालना न केवल तकनीकी अपराध की श्रेणी में आता है, बल्कि यह प्रशासनिक अराजकता और विभागीय निगरानी तंत्र की विफलता को भी उजागर करता है। यह प्रकरण केवल एक ठेकेदार की मनमानी तक सीमित नहीं है, बल्कि लोक निर्माण विभाग के अधिकारियों की कार्यप्रणाली, साइट निरीक्षण व्यवस्था और परियोजना पर्यवेक्षण प्रणाली पर भी गंभीर प्रश्नचिन्ह खड़ा करता है कि बिना सीमांकन निजी भूमि में निर्माण कैसे हुआ, बिना स्वीकृति यह कार्य किसके निर्देश पर किया गया, तकनीकी निरीक्षण रिपोर्ट कहां है और परियोजना अभिलेखों में भूमि उपयोग की स्वीकृति दर्ज क्यों नहीं है। शिकायतकर्ता किसान ने प्रशासन से मांग की है कि उसकी भूमि में डाली गई अवैध पाइपलाइन को तत्काल हटाया जाए, भूमि की पूर्व स्थिति बहाल की जाए, दोषी ठेकेदार पर विधिसम्मत कार्रवाई की जाए तथा संबंधित विभागीय अधिकारियों की जवाबदेही तय करते हुए भविष्य में इस प्रकार की घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने हेतु सख्त दिशा-निर्देश जारी किए जाएं। यह मामला ग्रामीण क्षेत्रों में विकास परियोजनाओं की आड़ में किसानों के भूमि अधिकारों की अनदेखी, तकनीकी नियमों की उपेक्षा और प्रशासनिक लापरवाही का गंभीर उदाहरण बनकर सामने आया है, जो शासन-प्रशासन की पारदर्शिता, जवाबदेही और विधिक व्यवस्था की वास्तविक परीक्षा के रूप में देखा जा रहा है।

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