…प्रेस क्लब का यह चुनाव केवल पद पाने की होड़ नहीं है, यह एक ऐसा निर्णायक मोड़ है जहाँ यह तय होना है कि आने वाले वर्षों में संगठन किस राह पर चलेगा—ठहराव और समझौते की, या साहस और प्रगति की। जब क्लब के हर सदस्य का भविष्य और पत्रकारिता की गरिमा दांव पर हो, तो स्वाभाविक है कि निगाहें टिकेंगी उस नेतृत्व पर जो ईमानदार भी हो, संवेदनशील भी हो और दूरदर्शी भी। ऐसे समय में एक ही नाम सबसे बुलंद और सबसे साफ स्वर में सामने आता है—अंकुर जायसवाल।

आज क्लब के भीतर जो माहौल है, वह किसी से छुपा नहीं। वर्षों से चली आ रही गुटबाज़ी और अंदरूनी खींचतान ने संगठन की चमक फीकी कर दी है। प्रेस क्लब की गरिमा, जो पत्रकारिता की असली ताक़त का प्रतीक मानी जाती है, कई बार संकुचित होती नज़र आई है। ऐसे हालात में एक ऐसे मुखिया की ज़रूरत है जो दीवारों को गिरा सके, दरारों को भर सके और सबको साथ लेकर एक नया अध्याय शुरू कर सके। अंकुर जायसवाल वही नाम है जो इन उम्मीदों को हक़ीक़त में बदल सकता है।
तुलसीदास की अमर पंक्तियाँ—“मुखिया मुख सो चाहिए, खान पान को एक। पाले पौषे सकल अंग, तुलसी सहित विवेक।”—आज भी नेतृत्व की कसौटी तय करती हैं। क्लब को चाहिए ऐसा मुखिया जो अपने स्वार्थों से ऊपर उठकर हर सदस्य को बराबरी का हिस्सा दे, जो निर्णय लेते समय किसी के दबाव या दिखावे में न आए, और जो विवेक व पारदर्शिता के साथ संगठन को मजबूती प्रदान करे। यह सब गुण अंकुर जायसवाल में भरपूर मौजूद हैं।
उनका अब तक का जीवन और पत्रकारिता की यात्रा ही इस बात की गवाही देती है। वे उन नेताओं में नहीं हैं जो कुर्सी के लिए रिश्ते बनाते और तोड़ते हैं। वे उन पत्रकारों में हैं जो हर साथी के सुख-दुख में खड़े होते हैं। यही वजह है कि उनके नाम पर सिर्फ चर्चा नहीं हो रही, बल्कि एक विश्वास जग रहा है।
इस चुनाव में मुकाबला केवल उम्मीदवारों का नहीं है, बल्कि विचारधाराओं का है। एक तरफ है जड़ता, समझौता और पुराने ढर्रे का बोझ। दूसरी तरफ है ऊर्जा, पारदर्शिता और संगठन को नई ऊँचाई पर ले जाने की दृष्टि। इस दूसरे पक्ष का चेहरा हैं—अंकुर जायसवाल।
उनके नेतृत्व से क्लब को मिलेगा—
साहस, जो सच्चाई और निष्पक्षता के साथ खड़ा हो सके।
समानता, जहाँ हर सदस्य की आवाज़ मायने रखे।
पारदर्शिता, जिससे कोई निर्णय बंद कमरों में न लिया जाए, बल्कि सभी की सहमति से हो।
सक्रियता, जो क्लब को ठहराव से बाहर निकालकर नई ऊँचाइयों तक ले जाए।
अंकुर जायसवाल की पहचान किसी राजनीतिक चाल से नहीं, बल्कि उनकी सादगी और साफगोई से बनती है। यही गुण उन्हें भीड़ में सबसे अलग और सबसे भरोसेमंद बनाते हैं।
अब सवाल यह नहीं है कि उम्मीदवार कौन-कौन हैं। असली सवाल यह है कि संगठन को आगे कौन बढ़ा सकता है?
क्या क्लब को फिर उसी ढर्रे पर चलाना है, जहाँ गुटबाज़ी और असहमति का साया मंडराता रहे?
या फिर वह नया सूरज उगाना है, जहाँ हर सदस्य एक परिवार की तरह एक-दूसरे का सहारा बने?
इस सवाल का जवाब प्रेस क्लब के हर जागरूक सदस्य को अपने दिल से पूछना होगा। और जब दिल से पूछा जाएगा, तो एक ही नाम गूंजेगा—अंकुर जायसवाल।
इतिहास गवाह है कि जब संगठन को सही समय पर सही नेतृत्व मिलता है, तो उसकी चमक दुनिया देखती है। आज प्रेस क्लब उसी मोड़ पर खड़ा है। और इस मोड़ पर सही दिशा दिखाने वाला चेहरा है—अंकुर जायसवाल: बदलाव का चेहरा, उम्मीद की आवाज़ और भविष्य का सच्चा मुखिया।
